मैंने कुछ नहीं जाना है,
सब स्वार्थ है मेरा ये माना है,
बिह्ढ् जीवन के गलियारे,
फिरते हम सब मारे मारे,
जैसे कोई बंजारे...
साँसे घुलती अंतर्मन में,
सपने घुलते,घोर तम में,
और टूटें हम सब में...
मैंने कुछ नहीं जाना है,
सब स्वार्थ है मेरा ये माना है,
१८ जनवरी २०१०
