Sunday, January 17, 2010

सब स्वार्थ है मेरा

मैंने कुछ नहीं जाना है,
सब स्वार्थ है मेरा ये माना है,


बिह्ढ् जीवन के गलियारे,

फिरते हम सब मारे मारे,

जैसे कोई बंजारे...


साँसे घुलती अंतर्मन में,

सपने घुलते,घोर तम में,

और टूटें हम सब में...


मैंने कुछ नहीं जाना है,
सब स्वार्थ है मेरा ये माना है,

१८ जनवरी २०१०