मैंने कुछ नहीं जाना है,
सब स्वार्थ है मेरा ये माना है,
बिह्ढ् जीवन के गलियारे,
फिरते हम सब मारे मारे,
जैसे कोई बंजारे...
साँसे घुलती अंतर्मन में,
सपने घुलते,घोर तम में,
और टूटें हम सब में...
मैंने कुछ नहीं जाना है,
सब स्वार्थ है मेरा ये माना है,
१८ जनवरी २०१०

साँसे घुलती अंतर्मन में,
ReplyDeleteसपने घुलते,घोर तम में,
और टूटें हम सब में...
Dard kee kasak liye hue hai yah rachna!
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ReplyDeleteBhai, tu to kavi ban gaya re!
ReplyDeleteMubarak ho itne sare comments!
par jab to aisi aisi kavita likhata hai na, apun ko bahut bura lagata. yaar apun ko maa ki yad aati aur yaar apun ka rone ka man hota. bhai tu aisi kavita na likha kar. bhai tu mast kavita likha kar.